श्रीः
।। श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् – सुन्दरकाण्डम्॥
प्रथमः सर्गः। १ ।।
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पीड्यमानस्तु बलिना महेनद्रस्तेन पर्वतः ।
सलिलं संप्रसुस्राव मदमत्त इव द्विपः ॥ १६ ॥
।।
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बलिना - பலவானான
तेन - அவரால்
पीड्यमानः - ஊன்றப்பட்ட
महेन्द्रः - மஹேந்திர
पर्वतः तु - மலையும்
मदमत्तः - மதித்துக்கொழுத்த
द्विपः - யானை
इव - போல்
सलिलं - நீரை
संप्रसुस्राव - பெருக்கிற்று.

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