...............................श्रीः
॥ श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम् सुन्दरकाण्डम्॥
**********प्रथमः सर्गः। १ ।।
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खे यथा निपतन्त्युल्का ह्युत्तरानताद्विनिस्सृता ।
दृश्यते सानुबन्धा च तथा स कपिकुञ्चरः ॥ ७४ ॥

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खे...............- ஆகாயத்தில்
उत्तरान्तात् ..- வடதிசையிலிருந்து
विनिस्सृता...- தோன்றி
निपतन्ती च.- விழுகிறதும்...
सानुबन्धा
....- வாலுடன்கூடியதுமான
उल्का यथा.- கொள்ளி எப்படியோ
तथा हि .....- அப்படி
सः ............- அந்த
कपिकुञ्चरः.- வானரவீரர்
दृश्यते.......- காணப்பட்டார்.
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